भारत सरकार ने पेट्रोलियम क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए डीजल में एथेनॉल मिलाने के पिछले प्रयासों की विफलता के बाद अब Isobutanol के साथ परीक्षण शुरू कर दिए हैं। अप्रैल 2026 की ताजा रिपोर्ट और Cartoq के विश्लेषण के अनुसार, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने पुष्टि की है कि डीजल में एथेनॉल मिलाने के प्रयोग सफल नहीं रहे क्योंकि इससे इंजन की कार्यक्षमता और सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।
अब Automotive Research Association of India (ARAI) डीजल में 10 प्रतिशत Isobutanol मिलाने की व्यवहार्यता पर विस्तृत परीक्षण कर रहा है। यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन सकता है जो व्यावसायिक स्तर पर डीजल में इस बायोफ्यूल का उपयोग करेगा। यह कदम भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करने और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हो सकता है।
एथेनॉल के साथ डीजल मिश्रण में आईं प्रमुख चुनौतियाँ
डीजल में एथेनॉल मिलाने के प्रयासों के विफल होने के पीछे कई तकनीकी और सुरक्षा कारण रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या ‘Flash Point’ में आने वाली गिरावट थी; एथेनॉल मिलाने से डीजल का फ्लैश पॉइंट बहुत कम हो जाता है, जिससे परिवहन और भंडारण के दौरान आग लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अलावा एथेनॉल और डीजल का प्राकृतिक रूप से मिश्रण (Miscibility) नहीं हो पाता है और इसके लिए अतिरिक्त रसायनों की आवश्यकता पड़ती है जो लागत बढ़ा देते हैं।
एथेनॉल में नमी सोखने की प्रवृत्ति (Hygroscopic) होती है, जिसके कारण इंजन के पुर्जों में जंग लगने और ‘Phase Separation’ जैसी समस्याएँ सामने आईं। एथेनॉल का Cetane Number भी काफी कम होता है, जिसके कारण डीजल इंजनों में ‘कमबस्टन’ यानी दहन की प्रक्रिया सुचारू रूप से नहीं हो पाती और इंजन में ‘Diesel Knock’ की समस्या पैदा हो जाती है।
Isobutanol के फायदे: डीजल के लिए एक बेहतर साथी
एथेनॉल के मुकाबले Isobutanol को डीजल के लिए एक अधिक अनुकूल विकल्प माना जा रहा है क्योंकि इसकी रासायनिक संरचना डीजल के काफी करीब है। Isobutanol की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) एथेनॉल से कहीं अधिक है, जिसका मतलब है कि यह माइलेज में बहुत कम गिरावट के साथ बेहतर प्रदर्शन प्रदान करता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Isobutanol डीजल के साथ आसानी से मिल जाता है और इसमें पानी सोखने की समस्या भी बहुत कम होती है, जिससे इंजन के ईंधन तंत्र में जंग लगने का खतरा नहीं रहता। इसका फ्लैश पॉइंट भी एथेनॉल से अधिक है, जो इसे सुरक्षित बनाता है। यह इंजन के रबर सील और धातु के पुर्जों के लिए भी कम नुकसानदेह है, जिससे पुराने इंजनों में भी इसके उपयोग की संभावना बढ़ जाती है।
पायलट प्रोजेक्ट और 2026-27 के लिए लक्ष्य
Isobutanol मिश्रण को लेकर वर्तमान में भारत में कई महत्वपूर्ण शोध और पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं। फरवरी 2026 में Praj Industries ने घोषणा की है कि वे एक साल के भीतर 10 प्रतिशत Isobutanol-Diesel मिश्रण के परीक्षण के लिए एक ‘डेमो प्लांट’ स्थापित करेंगे। ARAI के नेतृत्व में चल रहे इन परीक्षणों में 18 महीने का समय लगने की उम्मीद है, जिसमें लैब टेस्ट और फील्ड ट्रायल शामिल होंगे।
सरकार का लक्ष्य है कि वित्तीय वर्ष 2027-28 तक डीजल में बायोफ्यूल मिश्रण को औपचारिक रूप से लागू किया जा सके। इसके अलावा Kirloskar जैसे इंजन निर्माताओं ने पहले ही Isobutanol मिश्रण से चलने वाले जेनरेटर सेट का प्रदर्शन करके इसकी तकनीकी व्यवहार्यता को साबित कर दिया है।
आर्थिक लाभ और भविष्य की चुनौतियाँ
Isobutanol के उत्पादन से न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि यह चीनी मिलों और किसानों के लिए भी आय का एक नया जरिया बनेगा। एथेनॉल उत्पादन संयंत्रों में थोड़े से बदलाव (Retrofitting) करके ही Isobutanol का उत्पादन किया जा सकता है, जिससे अतिरिक्त पूंजी निवेश की जरूरत कम होगी।
हालांकि, वर्तमान में इसकी उत्पादन लागत डीजल के मुकाबले थोड़ी अधिक है, जिसे कम करने के लिए उद्योग जगत सरकार से ‘Biofuel Policy’ के तहत वित्तीय सहायता और स्पष्ट दिशानिर्देशों की मांग कर रहा है। यदि सरकार एथेनॉल की तरह ही Isobutanol के लिए भी मिश्रण अनिवार्य (Mandate) करती है, तो यह भारत के ग्रीन एनर्जी लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा। वर्तमान में भारत के पास लगभग 800 करोड़ लीटर का सरप्लस एथेनॉल उपलब्ध है, जिसे Isobutanol में बदलकर डीजल बाजार की विशाल मांग को पूरा किया जा सकता है।









